करोना काल में “मंदिर” या “अस्पताल”…

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लखनऊ: दिसंबर 2019 से ही चीन के वुहान शहर से करोना पूरे विश्व में फैलना शुरू हो चुका था। ये बीमारी भारत में भी प्रवेश कर चुकी थी। भारत में करोना का पहला मामला 30 जनवरी को सामने आया था। 30 जनवरी से 2 फरवरी के बीच में भारत में केरला के मल्लीपुराम में करोना के कुल 3 मामले सामने आए थे। इसका मतलब सबको जनवरी में ही पता चल चुका था कि करोना जैसी वैश्विक महामारी भारत में प्रवेश कर चुकी है।
उसके बाद भी उस महामारी से निपटने, उसका सामना और रोकथाम लगाने के लिए किसी भी तरह की कोई व्यवस्था पहले से नहीं की गई । किसी भी तरह के अस्पताल के निर्माण की नींव रखना तो दूर की बात है, जो अस्पताल वर्तमान समय में कार्यरत हैं उन अस्पतालों में भी करोना पीड़ित मरीजों के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई।
करोना कॉल में अस्पतालों की स्थिति-
भारत में प्रतिदिन लगभग 56 हजार करोना के मरीज सामने आ रहे हैं। पीड़ित मरीजों की संख्या लगभग 2000000 के पार हो चुकी है। इस बीमारी से मरने वालों की संख्या लगभग 50000 हो चुकी है।
1.यही कारण है कि लगातार अस्पतालों में वेंटीलेटर, आईसीयू वार्ड, आइसोलेशन वार्ड, पीपीई किट,बेड की कमी पड़ रही है लेकिन उनकी व्यवस्था का कोई इंतजाम नहीं किया गया है।
2.अस्पताल में बेड ना मिलने के कारण उनको भर्ती नहीं किया जाता है।
3.अस्पताल के अंदर कर्मचारी भी कम होते हैं स्वीपर या वार्ड बॉय सफाई का भी काम करते हैं, मरीज को भी देखते हैं उन्हें दवा भी देते हैं। डॉक्टर और नर्स की भी कमी देखी गई। इस तरह की अव्यवस्था अस्पतालों में देखी गई है । भारत में करोना से मरीजों के मरने की संख्या भले ही कम हो लेकिन वह संख्या और भी कम हो सकती थी अगर उनका समय पर इलाज हो जाता।
मंदिर की जगह अस्पताल क्यों बनना चाहिए…
1. जब कोई बीमार पड़ता है तो वह अपना इलाज कराने पहले मंदिर नहीं पहले अस्पताल जाता है।
2. अस्पताल में किया गया दान अस्पताल के प्रयोग में आता है, मरीजों के इलाज के प्रयोग में आता है लेकिन मंदिर में किया गया दान समाज सेवा के काम नहीं आता।
4. मंदिरों की जगह अस्पताल की व्यवस्था को सही करना चाहिए क्योंकि देश की जनसंख्या बहुत है बीमारी भी उतनी ही है डॉक्टर कम है मरीजों की संख्या ज्यादा है। सरकारी अस्पतालों में कोई व्यवस्था नहीं है। प्राइवेट अस्पताल महंगे होते हैं जहां आम आदमी अपना इलाज नहीं करा सकता है। अस्पतालों में साफ-सफाई,सुविधाएं कर्मचारियों की व्यवस्था सुनियोजित ढंग से होनी चाहिए।
5. देश में 11 हज़ार की आबादी पर एक डॉक्टर होता है,संख्या तय मानकों से 11 गुना कम है।
6. मंदिर ऐसी जगह है जहां पर हर आदमी समान नहीं है, वहां हर किसी को जाने की इजाजत नहीं होती है, लेकिन अस्पताल में हर आदमी अपना इलाज समान रूप से करा सकता है।
7. पूरे विश्व में अगर हमारे देश का नाम होगा तो वह मंदिर के कारण नहीं अस्पताल के कारण होगा, क्योंकि कहीं भी मंदिर की गिनती नहीं होती है अस्पताल की गिनती होती है।
यहां पर मंदिर बनने से किसी को दिक्कत नहीं है, हम ये नहीं कहते है की आप मंदिर मत बनवाइए , लेकिन उतना ही ध्यान अस्पताल को बनवाने में भी दीजिए । किसी की आस्था को हमें ठेस नहीं पहुंचाना है,लेकिन वर्तमान समय किस चीज की आवश्यकता वह देखना जरूरी है। मंदिर अगर बाद में बन जाता तो किसी का कोई नुकसान नहीं होता लेकिन अस्पताल ना बनने के कारण बहुत सारे मरीजों को अपनी जान गवानी पड़ रही है। वर्तमान समय में करोना चल रहा है अगर किसी को करोना हो जाता है तो वह मंदिर जाता है या अस्पताल आप विचार करिए।आम आदमी अस्पताल के चक्कर लगाता है अस्पताल में लाइन लगाकर खड़ा होता है जबकि वही आदमी नेता को वोट देकर के सरकार में लेकर आता है,लेकिन फिर वही सरकार जनता के हित का ना सोचकर मंदिर बनवा रही है।क्या सरकार को नहीं पता है कि जनता का हित मंदिर में है या अस्पताल में है ?भारत धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश है। सरकार में आने के बाद सत्ता में बैठे लोग संवैधानिक पद पर होते हैं। संवैधानिक पद पर बैठे हुए लोगों को धार्मिक बातें नहीं करना चाहिए। उनके लिए भारत का हर धर्म,संप्रदाय,जाति,वर्ग समान होता है उन्हें मंदिर मस्जिद में नहीं पड़ना चाहिए उन्हें धार्मिक स्थलों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।धार्मिक स्थलों पर कार्य करना सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए ।सरकार की प्राथमिकता अस्पताल,शिक्षा, रोजगार उद्योग धंधे,अनुसंधान केंद्र,विश्वविद्यालय और विद्यालय को बनवाने की होनी चाहिए, जो जनता के हित के लिए और समाज की सुरक्षा के लिए।अगर सरकार अस्पताल बनवाती है तो किसी तरह का कोर्ट केस नहीं लड़ना पड़ता, मंदिर या मस्जिद नहीं तोड़वाना पड़ता, कोई विवाद नहीं होता और कोई इसके लिए आपत्ति भी नहीं जताता।
देश में धर्म के नाम पर कोई आस्था नहीं सिर्फ राजनीति होती है,और यह राजनीति सिर्फ इसी में सिमट के रह गई है जिस कारण देश में बर्बाद हो रहा है। पिछले 7 से 8 महीने से करोना फैल रहा है। इतने दिनों में किसी एक या दो अस्पताल की नींव तो रख सकते थे। कोई अगर मंदिर बनने का विरोध करता है तो उसको देशद्रोही साबित किया जाता है।
क्या हम जिस को वोट देते हैं हम उससे सवाल नहीं कर सकते हैं, कि आप मंदिर क्यों बनवा रहे हो अस्पताल क्यों नहीं ?
मीडिया सिर्फ मंदिर का प्रपंच दिखाती है। हम क्या करें मंदिर का प्रपंच देखकर। मीडिया को असल खबर दिखानी चाहिए कि अस्पताल कितने बन रहे हैं, अस्पताल क्यों नहीं बन रहे हैं, अस्पतालों में व्यवस्था क्या है, मरीजों का इलाज सुनियोजित ढंग से हो रहा है या नहीं। यह आपको तय करना है कि आपके लिए आपके बच्चे के लिए और आपके परिवार के लिए अस्पताल जरूरी है या मंदिर। हमें अस्पताल और डॉक्टर चाहिए, मंदिर और पुजारी नहीं।
मैंने यह आर्टिकल सरकार के लिए नहीं मैंने यह आर्टिकल जनता को इस विषय पर अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए लिखा है।

रिपोर्ट: मधु लता, लखनऊ.

 

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